"इस "तमिस्रलोक की छलनायें" नामक कृति में व्यक्त विचारों का आशय सिर्फ यह है कि ज्ञानरूपी प्रकाश पर अज्ञान, अंधकार, आच्छादित न हो पाये। देश में गाँधी जी का स्वच्छता अभियान, आवासहीन गरीबों को कुटिरें, एवं एकलव्य आवासीय विद्यालयों का विचार सरीखे मन्तव्य सर्वोपरि होकर भी व्यावहारिक रूप में व्यक्ति, समाज, अथवा प्रबंधन के किसी अंग द्वारा कहीं छल न जायें। यद्यपि "सर्वेभवन्तु सुखिनः" की कामना पूर्ण होना संभव नहीं, तथापि व्याप्त भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, महिला उत्पीडन, धर्म जाति अर्थ मूलक हीनता आधारित असमानता, कृषक, मजदूरों का शोषण- उत्पीड़न एवं नशा सरीखी विद्रूपताओं का उन्मूलन तो अवश्य संभव है। उक्त रचना के माध्यम से देश को समुन्नते एवं उसकी नैष्ठिक चौकीदारी करने की अपेक्षा की गई है। यह दायित्व हम सभी का है, न कि एक नायक का, इस कृति का उद्देश्य महज देशवासियों को जागरूक करना है, किसी के मान-सम्मान को आहत करना रंचमात्र नहीं।"
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