महर्षि अगस्त्य का जन्म महाविष्णु की अनुग्रह से हुआ। वे सकल शास्त्रज्ञ, वेद-वेदाँगों के ज्ञानी थे। जब इल्वल-वातापि नाम के दो राक्षस राहगिरो को बिना कारण संहार करते थे उनका संहार अगस्य से हुआ। विंध्य पर्वत जब अपनी ऊँचाई को बढ़ा रहा था तब उस पर महर्षि अगस्त्य ने रोक लगाई। युद्ध भूमी पर श्रीराम को "आदित्य हृदय" का उपदेश किया। तमिल भाषा में अनेक रचनाँए की। "श्री ललिता सहस्रनाम" का रचैता महर्षि अगस्त्य हैं।
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