वक्त की रफ्तार को कोई ना रोक सका, गुजरता समय मांडवी के मौन वनवास को बढ़ाता जा रहा था. वह अपने साथ हुए बर्ताव व अपमान को भी भूल ना सकी थी. किशोरावस्था का प्यार उसे ना मिल पाया था, पति से हमेशा उपेक्षित भाव मिला. राम के वनवास जाने के पश्चात भरत ने नगर के बाहर वनवासी रूप में जीवन जीने का मन बना लिया था. महल में अपने साथ हुए भेदभाव को भी मांडवी भूल न पाई थी.
समय का चक्र बढ़ता जा रहा था, अजनबी युवक का सानिध्य ही मांडवी को थोड़ा सुकून दे पाता था. राम आज चौदह वर्ष पश्चात अयोध्या आ रहे थे, साथ ही भरत का प्रण भी पूरा हो गया था, युवक यह जान चुका था. उसने मांडवी को महल तक छोड़ दिया व अपने प्यार की निशानी नौलखा हार दे दिया.
धोबी के वचनों को दिल से लगा राम ने सीता को वनवास में छोड़ आने का कहा तो मांडवी का हृदय हाहाकार कर उठा. वह क्रोध से भर उठी और अपने आप को मान अपमान का शिकार तो बताया ही साथ ही सीता के साथ हुए न्याय-अन्याय का जिक्र भी किया, किंतु वह हार गई निष्ठुर समाज के ताने-बाने से.
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