कवि मित्रों! और सभी सामाजिक, बौद्धिक और प्रेम भाव की सत्ता में विलीन मानव जनों को मेरे खण्ड काव्य का यह द्वितीय काव्य खण्ड ' प्रेम - भाव ' समर्पित है क्योंकि इसे रचने में मुझ को जो भी भाव मिला वह इन्हीं से ही मिला और प्रेरणा भी प्रेम भाव से ही मिली और मेरे आलोचकों और पाठकों ने प्रेम भाव के विषय में जो कुछ बताया और सिखाया इस खण्ड काव्य में उन सबका ही खंडन है।
यह खण्ड काव्य ' प्रेम - भाव ' , जिसकी संकल्पना के साथ मेरी स्वयं की प्रेम के प्रति क्या भावनाएं है , मैं वह प्रस्तुत कर रहा हूं।
आप सभी काव्य प्रेमियों और पाठकों से मेरा निवेदन है कि जब भी आप इस काव्य का रंजन करें तब पूर्ण रूप से ही करें ; किसी पंक्ति का संकुचित रूप से अर्थ ना निकालें।
अंततः मैं आपकी ओर...