मिली तमाम वो शै जिनकी आरजू ही नहीं मेरे नसीब में सब कुछ है सिर्फ तू ही नहीं तेरी याद से दिल भरा तो रहेगा मगर ज़ीस्त में इक ख़ला तो रहेगा अधूरी रही क्यूँ मुहब्बत हमारी हमें ख़ुद से ही ये गिला तो रहेगा ये तबस्सुम लबो का झूठा है सच तो ये है कि दिल तो टूटा है जहाँ चैन था मेरी आवारगी को ये दिल याद करता है फिर उस गली को न दिल आने देता है दिल में किसी को करे कौन पूरी तुम्हारी कमी को तुझको भुलाना वैसे तो मुश्किल नहीं लगा लेकिन तेरे बग़ैर कहीं दिल नही लगा ख़ाली रहा ये दिल का मकाँ बाद में तेरे कोई भी इसमें रहने के क़ाबिल नहीं लगा इसी पुस्तक से
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