"हर दिन एक नकाब पहन कर निकलता है, वो इंसान, ख़ुद की पहचान से डरता है" मुखौटा .... हर चेहरे पर चढ़ा है , और अक्सर हम खुद ही इससे अनजान भी होते हैं..... दिल चाहता कुछ और है , मगर हम ज़िंदगी में करते कुछ और है, कभी समाज के दबाव में , कभी किसी के प्रभाव में या फिर कभी किसी अभाव में इसी दोहरी ज़िंदगी को ज़रा नज़दीक से देखने की कोशिश , कुछ खुद को समझाने की इच्छा ..... या फिर दबे हुए भावों को ही हमने पहना दिया है ......एक मजबूरी का मुखौटा.
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